Thursday, February 14, 2013

प्रेम एक भावना नहीं यह एक विकल्प है

यदि हम उत्पत्ति 1:28 और 31 पढ़ें तो पता चलता है कि परमेश्वर ने आदम और हवा को आशीषित किया और जो भी परमेश्वर ने रचा वह सब अच्छा था |
इसका मतलब है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने रचा वह पवित्र था, अमर था और आशीषित था 
लेकिन उत्पत्ति 3:6 और 7 से पता चलता है कि पहले मनुष्य और उसकी स्त्री ने पाप किया और उसके फल स्वरुप परमेश्वर का प्रेम प्रकट हुआ |
हैं न चौकाने वाली बात!
परमेश्वर ने इस पृथ्वी को शापित कर दिया और मनुष्य को कठिन परिश्रम व अपने पर्यावरण की देख भाल एक ट्रेनिंग के तौर पर दे दी, जिससे कि उसके उद्धार की योजना  फलान्वित हो सके, क्योंकि "मनुष्य का प्रेम स्वार्थी हो गया था |"
परमेश्वर ने अपना पुत्र यीशु हमारे लिए दिया, जो कि हमारा चंगा करने वाला और उद्धारक है 
उसके कार्य ने उसके दैविक अभिषेक को सिद्ध कर दिया 
उसके हर कार्य में प्रेम, करुना और अनुराग स्पष्ट दिखाई दिए 
उसी पुत्र ने हमे अपनी पवित्र आत्मा दी और हमें अपना निवास स्थान बना लीया 
इब्रानियों 13:8 कहता है कि यीशु मसीह जैसा कल थ, वही आज है और सर्वदा रहेगा 
आज यीशु का वही प्रेम, हम सबकी  ज़रुरत है 
1 कुरंथियों 6:19 कहता है कि तुम पवित्र आत्मा के मंदिर हो
क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर अपने राज्य के लिए तुम्हें अपने वरदान और फल देगा?
किस तरह के प्रेम को परमेश्वर प्रकट करना चाहेगा?
पढ़ें लुका 4:18,
कि प्रभु का आत्मा मुझ पर है, इसलिये कि उस ने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है, और मुझे इसलिये भेजा है, कि बन्धुओं को छुटकारे का और अन्धों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूं और कुचले हुओं को छुड़ाऊं।
यीशु का दिल द्रवित हुआ  
यीशु ने मनुष्य का स्वभाव लिया 
यीशु प्रेम से उनके करीब गया 
लोगों ने उसके प्रति कैसी प्रतिक्रिया की?
लोग उसके प्रति आकर्षित हुए 
लोग उसके द्वारा उत्साहित हुए 
लोगों ने उसे प्यार किया 
तुम्हारे विषय में क्या है, क्या तुम अपने शरीर को उसका मंदिर कहना चाहोगे?
पढ़ें 1 कुरंथियों 6:19-20,
क्या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह पवित्रात्मा का मन्दिर है; जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है, और तुम अपने नहीं हो? क्योंकि दाम देकर मोल लिये गए हो, इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो॥ 
मैं अपना पहले वाला प्रश्न दोहराना चाहूंगी, क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर अपने राज्य के लिए तुम्हें अपने वरदान और फल देगा?
हाँ! 
इसका मतलब इस शरीर के देखभाल की ज़रुरत है 
इसका मतलब है कि इस शरीर, आत्मा और प्राण के देखभाल की ज़रुरत है 
ऊपर वाला वचन कहता है कि उसने अपनी आत्मा अर्थात अपना स्वभाव हमें दे दिया है 
ठीक!
मैं तुम्हें एक उधारण देती हूँ -
जब मेरा पुत्र जन्मा तो वह कुछ मेरे और कुछ अरुण के स्वभाव को लेकर जन्मा | जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया उसके व्यवहार में हमारे व्यवहार की झलक दिखाई दी, क्योंकि वह हमारे संग-संग रह रहा था 
तुम नया जीवन पा चुके हो, परमेश्वर तुम्हारा पिता है और तुम परमेश्वर के निवास स्थान हो, इसका मतलब है कि परमेश्वर तुम्हारे संग-संग है 
अगर तुम परमेश्वर के हाथ में अपना नियंत्रण दे दो, तो तुम उसके स्वभाव के सहभागी हो जाओगे, लेकिन याद रहें- परिपक्वता एक प्रतिक्रिया है |
बोलो -  परिपक्वता एक प्रतिक्रिया है
एक पल लो और अपने आप को जांचों 
क्या तुम्हारा दिल लोगों के लिए द्रवित हुआ है?
क्या तुमने यीशु के स्वभाव को ग्रहण किया है?
क्या तुम्हारा दृष्टिकोण लोगों के प्रति प्रेम भरा है?
क्या तुम यीशु को तुम्हें अपने स्वभाव में रूपांतरित करने की अनुमति दोगे?
बोलो - हाँ! परमेश्वर अनुमति है 
उसका स्वभाव कैसा है?
पढ़ें गलातियों 5:22-23,
पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज, और कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई भी व्यवस्था नहीं। 
मैंने अपने पिछले सन्देश में नौ नहीं बल्कि पवित्र आत्मा के बारह फल का जिक्र किया था 
पढ़ें प्रकाशित वाक्य 22:1-2,
फिर उस ने मुझे बिल्लौर की सी झलकती हुई, जीवन के जल की एक नदी दिखाई, जो परमेश्वर और मेंम्ने के सिंहासन से निकल कर उस नगर की सड़क के बीचों बीच बहती थी। और नदी के इस पार; और उस पार, जीवन का पेड़ था: उस में बारह प्रकार के फल लगते थे, और वह हर महीने फलता था; और उस पेड़ के पत्तों से जाति जाति के लोग चंगे होते थे। 
फिर 
पढ़ें यहेज़केल 47:9-12,
और जहां जहां यह नदी बहे, वहां वहां सब प्रकार के बहुत अण्डे देने वाले जीव-जन्तु जीएंगे और मछलियां भी बहुत हो जाएंगी; क्योंकि इस सोते का जल वहां पहुंचा है, और ताल का जल मीठा हो जाएगा; और जहा कहीं यह नदी पहुंचेगी वहां सब जन्तु जीएंगे।
10 ताल के तीर पर मछवे खड़े रहेंगे, और एनगदी से ले कर ऐनेग्लैम तक वे जाल फैलाए जाएंगे, और उन्हें महासागर की सी भांति भांति की अनगिनित मछलियां मिलेंगी।
11. परन्तु ताल के पास जो दलदल ओर गड़हे हैं, उनका जल मीठा न होगा; वे खारे ही रहेंगे।
12. और नदी के दोनों तीरों पर भांति भांति के खाने योग्य फलदाई वृक्ष उपजेंगे, जिनके पत्ते न मुर्झाएंगे और उनका फलना भी कभी बन्द न होगा, क्योंकि नदी का जल पवित्र स्थान से निकला है। उन में महीने महीने, नये नये फल लगेंगे। उनके फल तो खाने के, ओर पत्ते औषधि के काम आएंगे। 
दो भिन्न पुस्तकों में से इन वचनों को पढ़ने के बाद यह निश्चित हो जाता है कि परमेश्वर हमारे शरीर और स्वभाव के प्रति चिंतित है और उसके स्वभाव के बारह अलग-अलग स्वाद है 
क्या तुम परमेश्वर के स्वभाव को खोजने के लिए तैयार हो?
चलिए हम प्रेम से शुरुआत करते है 
 पढ़ें 1 थिस्सलुनीकियों  4:9
किन्तु भाईचारे की प्रीति के विषय में यह अवश्य नहीं, कि मैं तुम्हारे पास कुछ लिखूं; क्योंकि आपस में प्रेम रखना तुम ने आप ही परमेश्वर से सीखा है।
कौन तुम्हें प्रेम सिखाएगा?
बोलो - परमेश्वर स्वयं 
आज के सामाज में प्रेम शब्द का दुरूपयोग होता है 
इस शब्द की हम इस तरह व्याख्या कर सकते है 
1. परमेश्वर का प्रेम-अनुराग जो बिना शर्त है 
2. पति-पत्नी का प्रेम-लगाव जो एक दूसरे के प्रति है 
3. पारिवारिक प्रेम जो परिवार के सदस्यों में होता है 
4. आपसी-प्रेम जो भाई-चारे या मैत्रीपूर्ण है 
इसके अतिरिक्त प्रेम अपवित्र है 
अब कौन है जो तुम्हें प्रेम सिखाएगा?
बोलो-पवित्र आत्मा
याद रहें 
वरदान दिए जातें है लेकिन फल विकसित होतें है 
अगर तुम एक फल का पौधा लगाना चाहो तो तुम क्या करोगे?
1. एक फल का चुनाव करोगे 
2. उसके लिए एक स्थान निर्धारित करोगे 
3. मिटटी की गुडाई करोगे 
4. पौधा लगाओगे 
5. जमीन सोफ्ट और गीली रखोगे 
6. उसका रखरखाव या ध्यान रखोगे 
इसका मतलब है पौध लगाने के पहले तुम छाटोगे और फिर चार से पांच साल तक उसकी देखभाल करोगे 
उसके बाद उस फल के पौधे का रूप दिखाई देगा 
इससे यह स्पष्ट पता चलता है कि परिपक्वता एक रात में नहीं आती, जैसे एक पेड़ का फल एकदम से नहीं बनाता उसी तरह एक व्यक्ति का गुण भी परिपक्व होने में समय लेता है 
यीशु ने मनुष्य के चरित्र के बारे में कहा 
पढ़ें मत्ती 7:16-20
उन के फलों से तुम उन्हें पहचान लोग क्या झाडिय़ों से अंगूर, वा ऊंटकटारों से अंजीर तोड़ते हैं? इसी प्रकार हर एक अच्छा पेड़ अच्छा फल लाता है और निकम्मा पेड़ बुरा फल लाता है। अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं ला सकता, और न निकम्मा पेड़ अच्छा फल ला सकता है। जो जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में डाला जाता है। सो उन के फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे।
मैं तुमसे प्यार करता हूँ यह कहना जितना सरल है, किसी को प्रेम करना उतना ही कठिन है 
ध्यान से सुनो और जांचों 
1. परमेश्वर के प्रति हमारा प्रेम प्रदर्शन 
पढ़ें मालाकी 3:8, 
अगर तुम परमेश्वर को दे नहीं सकतें हो तो तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा नहीं है, फिर परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कहाँ है? 
2. लोगों के प्रति हमारा प्रेम प्रदर्शन 
जब कोई व्यक्ति तुम्हारी मर्जी के विपरीत और तुम्हें अपशब्द कहें, तुम भड़क पड़ते हो, तुम्हारा लोगों के प्रति प्रेम कहाँ गया?
यीशु ने पिता से उसे पीढ़ा पहुचाने वालों को माफ़ कर देने को कहा 
3. पवित्र आत्मा के प्रति हमारा प्रेम प्रदर्शन 
पढ़ें गलातियों 5:19-21, 
कितनी बार दूसरो को आगे बढ़ता देख कर तुम्हारा दिल ईर्ष्या से भर जाता है, क्या तुम भूल गए कि तुम पवित्र आत्मा का मंदिर हो? 
2 राजा 18:30-38, में एलिया ने वेदी को पूरी तरह पानी से भिगो दिया लेकिन उसने जैसे ही परमेश्वर को आवाज़ लगाई स्वर्ग से आग उतरी और सब जला गई |
आज फिर उसी आग की हमें ज़रुरत है
आग जो हमारे चरित्र से सब कुछ जो अशुद्ध है जला दे 
जब अशुद्ध जल जायेगा बीमारियाँ भाग जायेंगी, तकलीफें भाग जायेंगी 
तब तुम पवित्र आत्मा का पवित्र मंदिर होगे 
जिसके हाथ लोगों को चंगाई देंगे 
जिसकी उपस्थिति लोगों को आशीषित करेगी 
अपने स्थान पर खड़े हो, 
परमेश्वर तुम्हे प्रेम सिखाना चाहता है 
क्या तुम प्रेम सीखने के लिए तैयार हो?
क्या तुम प्रेम को एक विकल्प बना रहें हो 
चलो प्रार्थना करें 
पिता परमेश्वर, होने पाए कि मैं आप के प्रेम से भर जाऊं  इसलिए मेरी मदद करें, ताकि मैं अच्छे फल धारण कर सकूं, मेरी मदद करें ताकि मैं अच्छे और बुरे फल को परख सकूं और मुझमें परमेश्वर का बिना शर्त वाला अनुराग बह सके प्रभु यीशु के नाम पर|
आमीन

Saturday, February 2, 2013

एक बेहतर समाधान


छमाही के इम्तिहान के बाद जब हम लोग रिपोर्ट कार्ड्स बना रहें थे, एक प्राइमरी की टीचर से रिपोर्ट कार्ड भरने में कुछ गलती हो गयी, प्राइमरी के प्रिंसिपल ने उससे कहा पूरे रिपोर्ट कार्ड्स बाहर से फोटोकॉपी कराओ और फिर से भरो| यह उसके लिए काफी मुश्किल काम था, उसने शिकायत की कि उसे नहीं पता था कि इस कॉलम में टिक नहीं करना था  |
इस पूरे किस्से में मुझे यह याद  है कि वह इस बात पर बहुत कटु, क्रोधित और हताश सी हो गयी थी |
अच्छा होता यदि प्राइमरी के प्रिंसिपल ने सफ़ेद-इंक सोलुशन का प्रयोग किया होता!
तुम क्या करोगे यदि कोई तुम्हारे प्रति गलत करे?
पढ़ें मत्ती 6:12,14-15
और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर।
परमेश्वर ने हम सबको एक बेहतरीन सफ़ेद-इंक दे रखी है
यह यीशु मिलेनियम उत्पादन है
उसने तुम्हें और मुझे मुफ्त में दिया है | इस उत्पादन का ब्रांड नाम “क्षमा” है| वह हमारी गलतियों पर उसका प्रयोग करता है और चाहता है कि हम भी उसका प्रयोग दूसरों की गलतियों पर करें | लेकिन कई बार हम इसका प्रयोग करने में असफल हो जातें हैं, और गलतियों को जबरदस्ती ब्लेड या फिर रबर से छुड़ाने की कोशिश करतें है, जिसके फलस्वरूप दाग पड़ जाता है
लेकिन सफ़ेद इंक एक अच्छा समाधान है, यह हमारी गलतियों को छिपा देगी और सफ़ेद जगमगाहट के साथ हमारी की गयी गलतियों से अनजान भी ना रखेगी
बोलो - मैं अपनी बीती हुयी गलतियों से अनजान नहीं हूँ
बोलो - सफ़ेद इंक एक बेहतर समाधान है
हमेशा मैं अपने छात्रों को यहाँ-वहां गलतिया करते हुए देखती हूँ, अगर हम इनका विश्लेषण करे, तो हमे स्पष्ट रूप से 3 विभिन्न स्तर दिखाई देतें है
1.   उन्होंने गलतियाँ की क्योंकि वे अभी परिपक्व नहीं हुयें है
2.   उन्होंने गलतियाँ की क्योंकि उनका पालन पोषण ठीक तरह से नहीं हुआ है
3.   उन्होंने गलतियाँ की क्योंकि वे यह स्कूल छोड़ कर जा रहें थे
जब भी कभी कुछ भी मेरे जीवन में होता है या फिर मेरे इर्द-गिर्द होता है, मैं तुरंत और सदैव समय लेती हूँ और छात्रों के जीवन के जरिये जीवन के पैटर्न का अध्यन करने लगती  हूँ. परमेश्वर का राज्य किसी स्कूल से कम नहीं है.
बोलो - मैं सीख रहा हूँ
बोलो - सफ़ेद इंक एक बेहतर समाधान है
जीवन का हर एक्शन मनुष्य के जीने की आतंरिक और बेसिक ज़रुरत पर निर्भर है, जो कि वास्तव में आत्म-प्रेम है |
अपने पास बैठे व्यक्ति से पूछो, तुम अपने को कितना प्यार करते हो?
बहुत बार जब हम अपने बीते हुए पल को देखते है तब सोचते है कि क्या अच्छा होता जो मुझे इन बातों का ज्ञान होता, तो मैं इनके साथ इस तरह ना करता
इस दृष्टिकोण से क्या तुम बोलोगे कि तुमने जो किया था वह गलत नहीं था!
बिलकुल नहीं, जो गलत है वह गलत है! लेकिन उन बातों को बताया जा सकता है, बोला जा सकता है
फिर भी, यह ज़रूरी है कि हम जाने कि हमने ऐसा क्या और क्यों किया, ताकि हम स्वयम को माफ़ कर सकें| यदि हम स्वयं को माफ़ नहीं करतें है तो हमारी अपनी उन्नति प्रभावित होती है
बोलो - यह समय बीती हुयी गलतियों के बोझे से मुक्त होने का है
बोलो - सफ़ेद इंक एक बेहतर समाधान है
हम सब सीख रहें है और बढ़ रहें है, चाहे जैसा भी हो हमारा विकास हो रहा है |हम सबके बीते हुए कल में शर्म और गलती का अहसास है| बचपन में बहुत बार हमे सजा मिली, जिसका कारण भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हुआ | हम छोटे थे इसलिए पूछने की रजामंदी नहीं मिली, पर उन लम्हों ने हमारे जीवन में “गलत हो”, “बुरे हो” या फिर “अपेक्षाकृत ठीक नहीं हो” ऐसी छाप छोड़ दी
यह नकारात्मक टिपण्णी हमे अधिक चोट ही पहुचाती है जो परमेश्वर के वचनों से परे है
परमेश्वर हमें अनोखा, विशिष्ट, आशीषित और अपनी आँखों का तारा कहता है
बोलो - मैं परमेश्वर की आँखों का तारा हूं
बोलो - सफ़ेद इंक एक बेहतर समाधान है
पढ़ें रोमियो 12:17-19
बुराई के बदले किसी से बुराई न करो; जो बातें सब लोगों के निकट भली हैं, उन की चिन्ता किया करो। जहां तक हो सके, तुम अपने भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो। हे प्रियो अपना पलटा न लेना; परन्तु क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, पलटा लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूंगा।
मुझे इन वचनों के दो शब्द बहुत पसंद है ये मेरे अन्दर आनंद भर देतें हैं
इन दो वचनों ने मुझे पापी से धर्मी बना दिया
ये बेहतरीन शब्द हैं “बदला” और “कोप”
क्या !! बदला और कोप, अरे ये कैसे बेहतरीन शब्द हो सकतें हैं!!
बाइबल में लिखा है कि परमेश्वर चाहता है कि हम सब उसके ज्ञान को जाने, वह चाहता है कि हम सब बच जाएँ  कभी मैं पापी थी और परमेश्वर के कोप तले थी और बहुत  तकलीफ में थी, लेकिन सोचो ये परमेश्वर का बदला और कोप ही था जो मैं उसे खोजने लगी, और उसकी सजा मुझे उसके राज्य में ले आई, इसका मतलब है कि परमेश्वर के कोप में घृणा नहीं है बल्कि बिगड़े हुए संबंधो का फिर से बनाना है | इसी कारण पौलुस ने लिखा कि बदला मत लो परमेश्वर के कोप को काम करने दो
तुम्हारा क्रोध कैसा है??? क्या ये संबंधो को जोड़ने या फिर तोड़ने वाला है ??
बोलो - परमेश्वर सक्षम है
बोलो - सफ़ेद इंक एक बेहतर समाधान है
परमेश्वर के दृष्टिकोण से - उससे कुछ भी छिपा नहीं है फिर भी वह हमेशा माफ़ कर देता है, हमारे पापों को भूल जाता है और उनका स्मरण नहीं करता है
पढ़ें इब्रानियों 8:12
क्योंकि मैं उन के अधर्म के विषय मे दयावन्त हूंगा, और उन के पापों को फिर स्मरण न करूंगा।
बोलो - परमेश्वर हमारे पापों को याद नहीं रखता है
बोलो - सफ़ेद इंक एक बेहतर समाधान है
माफ़ी से सम्बंधित 3 स्तर हैं
1.   बाहरी - हम उपरी मन से कहतें है कि माफ़ कर दो, या फिर माफ़ किया परन्तु दिल से ऐसा नहीं करते हैं
2.   भावनाओं पर आधारित - कई बार हम भावनाओं में बहकर माफ़ी मंगतें है या फिर माफ़ कर देतें है पर वास्तव में नहीं
3.   आत्मा की अगुवाई द्वारा - जब पवित्र आत्मा की अगुवाई होती है वह ही सच्चा पश्चाताप है, उसमें सदैव संबंधों का बनना है, हो सकता है कि लोगों के बीच सम्बन्ध फिर से ठीक ना हो, पर  हम और हमारा परमेश्वर फिर से एक हो जाते है
बहुत बार जब किसीसे गलतियाँ हो जाती है, लोग उसे तुच्छ समझने लागतें है जैसे वह अपराधी हैं, जैसे अब कुछ किया ही नहीं जा सकता, परमेश्वर का कोप उस पर है और वह नष्ट हो जायेगा, वह नरक में जायेगा, दुष्ट आत्माए उस पर है, वगेरह - वगेरह |
कानूनी तौर पर जब तक जज निर्णय ना दे तब तक, कटघरे में खड़े व्यक्ति को अपराधी नहीं कहा जा सकता है| इसलिए अच्छी रिपोर्ट जान लो - हमारा जज यीशु हमारे पाप माफ़ करने वाला  है
बोलो - मैं स्वर्ग के मार्ग पर हूं
बोलो - सफ़ेद इंक एक बेहतर समाधान है
याद रखो परमेश्वर के मार्ग पर चलना एक दिन में नहीं सीखा जा सकता है | यह एक यात्रा है
गलतियों के जरिये हम सीखते और बढ़तें है
हमारे सृजनहार के दृष्टिकोण से यह गलतियाँ नहीं बल्कि अनुभव है जो वह हमे दूसरो के मार्ग दर्शन के लिए देता है
पढ़ें इब्रानियों 12:1-3
इस कारण जब कि गवाहों का ऐसा बड़ा बादल हम को घेरे हुए है, तो आओ, हर एक रोकने वाली वस्तु, और उलझाने वाले पाप को दूर कर के, वह दौड़ जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें। और विश्वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले यीशु की ओर ताकते रहें; जिस ने उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था, लज्ज़ा की कुछ चिन्ता न करके, क्रूस का दुख सहा; और सिंहासन पर परमेश्वर के दाहिने जा बैठा। इसलिये उस पर ध्यान करो, जिस ने अपने विरोध में पापियों का इतना वाद-विवाद सह लिया कि तुम निराश होकर हियाव न छोड़ दो।
आनंदित हो क्योंकि तुम आगे बड़ रहें हो चाहे थोड़ा -थोड़ा ही क्यों ना हो
परमेश्वर का उद्धार, उसका प्यार है हमारे लिए, और उसका पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्ग दर्शन करेगा, रक्षा करेगा, प्रेम करेगा, माफ़ करेगा और फिर प्रेम करेगा |
बोलो - परमेश्वर ने हमें एक बेहतरीन सफ़ेद -इंक दी है
बोलो - यीशु मिलेनियम उत्पादन एक बेहतर समाधान है
प्रार्थना करो माफ़ी की, माफ़ कर दो, पुराने अपराधों या गलतियों की चोटों को मिटा दो, जिन्होंने दुःख पहुचाया है उन्हें परमेश्वर के हवाले कर दो
औए अपने जीवन में भरपूर पाने के लिए तैयार हो जाओ
अमीन

Wednesday, January 30, 2013

पहला फल पवित्र है


येशु परमेश्वर का पहला फल  है और परमेश्वर की निगाह में पवित्र है| उसी के जरिये सारी मानव जाति परमेश्वर के सन्मुख पवित्र ठहरी है
प्रथम  फल  के  अध्धयन के  जरिये हम जान पातें हैं कि  प्रथम फल परमेश्वर की निगाह में  पवित्र है  
और जो भी परमेश्वर की निगाह में पवित्र है वो उसे स्वीकार कर लेता है
क्या तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें स्वीकार करें?
हाँ
बोलो - मैं  पवित्र हूँ
परमेश्वर को हर समय   प्रथम स्थान पर रक्खो
अपनी पढाई में
अपनी दोस्ती में
अपने रिश्तों में
अपनी नौकरी में
अपने धन में
तुम जो भी करो उन सबमें
पढो मत्ती 6:33
इसलिये पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी।
परमेश्वर का राज्य कहाँ है?
जहाँ परमेश्वर के नियमों को माननेवाले मिलतें है
परमेश्वर केनियमों को मानने वाले कहाँ मिल सकतें है?
बोलो - मुझमें
पढो लुका 17:20-21
जब फरीसियों ने उस से पूछा, कि परमेश्वर का राज्य कब आएगा? तो उस ने उन को उत्तर दिया, कि परमेश्वर का राज्य प्रगट रूप से नहीं आता। और लोग यह न कहेंगे, कि देखो, यहां है, या वहां है, क्योंकि देखो, परमेश्वर का राज्य तुम्हारे बीच में है॥
और लुका 11:20
परन्तु यदि मैं परमेश्वर की सामर्थ से दुष्टात्माओं को निकालता हूं, तो परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुंचा।
बोलो - परमेश्वर का राज्य हमारे बीच में है
पढो लैव्यव्यवस्था 23:14
और जब तक तुम इस चढ़ावे को अपने परमेश्वर के पास न ले जाओ, उस दिन तक नये खेत में से न तो रोटी खाना और न भुना हुआ अन्न और न हरी बालें; यह तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में तुम्हारे सारे घरानों में सदा की विधि ठहरे॥
परमेश्वर तुम्हें अवश्य ही आशीष देगा
पढो रोमियो 11:16
जब भेंट का पहिला पेड़ा पवित्र ठहरा, तो पूरा गुंधा हुआ आटा भी पवित्र है: और जब जड़ पवित्र ठहरी, तो डालियां भी ऐसी ही हैं।
हमारा परमेश्वर कभी न बदलने वाला परमेश्वर है
उसके सिद्धांत  कभी न बदलने वाले हैं
उसके सभी आदेश हमारे प्रावधान और बहुतायत के लिए है
परमेश्वर हमारे जीवन में सभी उत्तम वस्तुओं को देखना चाहता है
तो हम क्या करें?
हम अवश्य ही परमेश्वर के शब्दों के सत्य  का अनुसरण करें
जब हर प्रथम भाग परमेश्वर की निगाह में पवित्र है तो रोमियो  11:16 के अनुसार परमेश्वर की उपस्थिती और उसका प्रावधान हमारे शेष को भी सुरक्षित कर देगा
लैव्यव्यवस्था 23 के अनुसार इस्राइलों को आदेश दिया गया था कि वो हर फसल के मौसम की शुरुवात में परमेश्वर सामने विशेष भेंट लाएं
जनवरी का महीना हमारी फसल के मौसम की शुरुवात है 
इस भेंट को प्रथम फल बोला गया क्योंकि ये हमारे आगें आने वाले या प्राप्त  होने वाली तनख्वाह या आशीषों   का पहला हिस्सा है यानी कि आने वाले 11 महीनों का भाग, इसका मतलब है परमेश्वर हमारी कमाई की देखभाल करेगा
बोलो - प्रभु येशु हम इस भाग को आपको देतें है क्योंकि हम अपनी पूरी फसल की पैदावार  को जानते है कि वो आपके द्वारा हमें मिलती है
बोलो - हम अपना प्रथम फल आपको देतें है क्योंकि ये आपका ही है
बोलो - ये अति सुंदर पवित्र शास्त्र  का सिद्धांत है जो हमारे जीवन में परमेश्वर की संतान होने के नाते लागू होता है
बोलो - जब हम परमेश्वर को भेंट देतें है हम   कहतें  है  कि  हमारा  सब  कुछ  परमेश्वर  का  है और हम विश्वास करतें है कि परमेश्वर हमारी हर ज़रुरत को पूरी करेगा
येशु परमेश्वर का पहला फल  है और परमेश्वर की निगाह में पवित्र है| उसी के जरिये सारी मानव जाति परमेश्वर के सन्मुख पवित्र ठहरी है
पिता मैं प्रभु यीशु के नाम पर प्रार्थना करती हूँ कि प्रथम फल के सिद्धांत को जीवन में अपनाना एक तरह से परमेश्वर की सामर्थ्य और उसके प्रावधान को स्मरण करना है, और पुरे विश्व से उसका सम्बन्ध सिद्ध करना है। प्रभु हम अपना पहला फल पुरे विशवास के साथ लाते हैं और परमेश्वर को बहुतायत के लिए धन्यवाद देते है।
आमीन 


Wednesday, January 2, 2013

कोई स्थिति निराशाजनक नहीं है

"सफलता दिमाग की सोच  है"
तुम्हारे रवैये के द्वारा तुम्हारी सोच निर्धारित होती है | अगर तुम्हारी सोच जीवन में सफलता पाने की है तो तुम अपने दिमाग और शरीर को अनुशाषित करोगे | यहीं से शुरुआत होती है जीत की |
प्रकाशित वाक्य 12:11 में लिखा है, "और वे मेमने के लहू के कारण और अपनी साक्षी के वचन के कारण उस पर विजयी हुए हैं"
यह मेमना कौन है?
पढ़ें युहन्ना 1:29, …….”देखो परमेश्वर का मेमना जो जगत का पाप उठा ले जाता है"
बोलो - मेरे पापों का भुगतान हो चुका है
बोलो - मैं विजयी हूं
कुछ समय पहले मैंने एक कहानी पढ़ी, जो एक गरीब आदमी के बारे में थी जो अमीर हो गया था | उस समय बहुत अमीर व्यक्ति ही कार खरीद सकते थे | अपनी अमीरी दिखाने के लिए उस व्यक्ति ने एक कार खरीद ली, और अच्छे कपडे व टोपी भी खरीदी | हर रोज़ सुबह वह अपनी कार से जाता और लोगों को अभिवादन करता था और शाम को लौट आता था, लेकिन उसे होर्न बजाने की कभी भी जरूरत नहीं पड़ी |
क्या तुम जानना चाहोगे ऐसा क्यों हुआ?
क्योंकि उसकी कार के आगे दो घोड़े बंधे थे जो पूरा दिन उसकी कार को खींचते थे
क्या तुम जानना चाहोगे कि घोड़े उसकी कार को क्यों खींचते थे?
क्योंकि उसको कार चलानी नहीं आती थी
बहुत बार हम भी उसी व्यक्ति जैसे होते है, जिसके अन्दर परमेश्वर के द्वारा दी गयी असीम सामर्थ है, पर अज्ञानता के कारण परमेश्वर के आशीषों से वंचित रहते है
बोलो - मुझमे सामर्थ है
बोलो - मैं आशीषों के दायरे में रहूँगा
मैं तुम्हे थोड़ा और आगे ले चलती हूं, यह तुम्हारी आँखों को खोल देगा और तुम परमेश्वर द्वारा दी गयी योग्यताओं को पहचानोगे
पढ़े लुका 16:19-26,
"एक धनी पुरुष था जो सदा बैजनी वस्त्र व मलमल पहिना करता था और प्रतिदिन बड़े धूमधाम व सुख-विलास से रहता था | और लाजर नाम का एक कंगाल व्यक्ति घावों से भरा हुआ उसके फाटक पर छोड़ दिया जाता था, उस धनवान पुरुष की मेज से जो तुकडे गिरते थे, उनसे वह पेट भरने को तरसता था | इसके अतिरिक्त कुत्ते भी उसके घावों को आकर चाटा करते थे  | ऐसा हुआ कि कंगाल पुरुष मर गया और स्वर्गदूतों ने उसे इब्राहिम की गोद में पहुंचा दिया | वह धनी पुरुष भी मरा और दफना दिया गया | तब अधोलोक में अत्यंत पीड़ा में पड़े हुए उसने अपनी आँखें उठायी और दूर से इब्राहीम को देखा जिसकी गोद में लाजर था | तब उसने पुकार कर कहा, "हे पिता इब्राहीम मुझ पर दया कर | लाजर को भेज कि वह अपनी उंगली का सिरा पानी में डुबो कर मेरी जीभ को ठंडा करे, क्योंकि मैं इस ज्वाला में पड़े तड़प रहा हूं"| परन्तु इब्राहीम ने कहा, "हे पुत्र स्मरण कर कि तू अपने जीवन में सब अच्छी वस्तुएं प्राप्त कर चुका है और इसी प्रकार लाजर बुरी वस्तुएं , परन्तु अब वह यहाँ शांति पा रहा है और तू पीड़ा में पड़ा तड़प रहा है |इसके अतिरिक्त हमारे और तुम्हारे मध्य एक अथाह खाई निर्धारित की गयी है कि यहाँ से कोई उस पार जाना भी चाहे तो ना जा सके, और वहां से यदि कोई इस पार हमारे पास आना चाहे तो ना आ सके |
यहाँ पर किन्ही बातों पर ध्यान दो
1 . कहानी बताने वाला कोई और नहीं यीशु है और वही न्याय के दिन न्यायाधीश होगा
2 . न्यायाधीश को सजा देने या माफ़ी देने का पूरा अधिकार है
3 . उससे मांगो तो वह तुम्हारे पाप माफ़ कर देगा
4 . धनी व्यक्ति की चाल परमेश्वर के सम्मुख सही नहीं थी, लेकिन उसने अपने काम-काज पर भली प्रकार ध्यान दिया हुआ था इसी कारण वह धनवान था, उसने सफलता तो पाई पर स्वर्ग खो दिया
5 . इसका मतलब है कि वह पाप कर रहा था
6 . भिखारी लाजर के पास सब सामर्थ थी जिससे वह इस दुनिया में सुख पूर्वक रह सकता था लेकिन उसने अपनी अज्ञानता के कारण सुख नहीं पाया
पढ़ें होशे 4:6, अज्ञानता के कारण  मेरी प्रजा नाश हो जाती है
7 . इसका मतलब है कि लाजर आलसी था और अज्ञानता के कारण परमेश्वर के दिए हुए आशीष को नहीं जानता था
8 . वह बीमार था और काम नहीं कर सकता था, इसी कारण वह धनी व्यक्ति की जूठन पर निर्भर था
9 . वह परमेश्वर की चंगाई से अज्ञान था
यहाँ पर इन दोनों के अंत को ध्यान से देखो, धनी को अनंत पीड़ा और भिखारी को अनंत जीवन मिला
बोलो - मैं नाश ना हूँगा
बोलो - क्योंकि मैं अज्ञान नहीं हूं
बहुत बार मैंने अपने गुजरे हुए कल में परमेश्वर से प्रश्न किया है, "बुरे व्यक्ति क्यों फलते-फूलते हैं?
ऐसा ही यिर्मियाह भी कहता है
पढ़े यिर्मियाह 12:1
हे यहोवा तू तो धर्मी है कि मैं अपना मुक़दमा तेरे सम्मुख लडूं, वास्तव में मैं न्याय की बातों का तेरे साथ विवाद करूंगा, दुष्टों का मार्ग क्यों सफल होता है? क्या कारण है जो विश्वासघात करते है वे सुख से रहते है?
जैसे-जैसे मैं परमेश्वर में बढ़ने   लगी, मैंने उसके तीन सिद्धांतों को जाना और समझा कि ऐसा क्यों होता है?
1 . मैंने उत्पत्ति 3:17 के अनुसार जाना, ........ इसलिए भूमि तेरे कारण शापित है | तू उसकी उपज जीवन भर कठिन परिश्रम के साथ खाया करेगा |
इसलिए प्रत्येक व्यक्यी कठिन परिश्रम से सफलता पातें है
2 . मैंने व्यवस्थाविवरण 8:17 और 18 के अनुसार जाना, "तू अपने मन में यह ना कहने लगे कि मैंने यह सारी संपत्ति अपने सामर्थ तथा बाहुबल से कमाई है, परन्तु तू अपने परमेश्वर यहोवा को स्मरण रखना क्योंकि वही तुझको संपत्ति प्राप्त करने का सामर्थ्य देता है कि वह अपनी उस वाचा को पूरी करे......."
3 . मैंने यह जाना कि संपत्ति विरासत से भी प्राप्त होती है
लोग कैसे संपती पातें है इस बात को मैं इस तरह से बता सकती हूं
१. कठिन परिश्रम से
2 . कठिन परिश्रम और परमेश्वर के अनुग्रह से
3 . विरासत में मिली संपत्ति से
4 . छल-कपट से
अगर मैं पूछूं किस तरह की संपत्ति सबसे अच्छी है तो तुम क्या कहोगे?
कठिन परिश्रम और परमेश्वर के अनुग्रह से!!!
बोलो - मैं हर दिन कठिन परिश्रम करता हूं
बोलो - मुझ पर परमेश्वर का अनुग्रह है
आज मैं तुम सभी को उत्साहित करना चाहूंगी और बताना चाहूंगी कि तुम कैसी भी स्थिति में क्यों ना हो, प्रभु यीशु में आशा है | इसलिए अपनी स्थिति से बाहर आओ और परमेश्वर द्वारा दी गयी योग्यता में प्रवेश करो और पवित्र आत्मा को अपने जीवन में काम करने दो और सफल जीवन जीयो
परमेश्वर चाहता है कि हम ज्ञानवान हों
परमेश्वर चाहता है कि हम समृद्धशाली हों
परमेश्वर चाहता है कि हम स्वर्ग में जाएँ ना कि नरक में
परमेश्वर चाहता है कि हम पाप मुक्त हों
परमेश्वर चाहता है कि हम बिमारी से छूटकारा पाएं
अपने स्थान पर खड़े हो और परमेश्वर से बात करो
उससे बोलो कि वह तुम्हें माफ़ कर दे और अपने अनुग्रह से भर दे
आमीन

Sunday, December 30, 2012

जीने की आतंरिक ज़रुरत

"जीवन का हर एक्शन मनुष्य के जीने की आतंरिक और बेसिक ज़रुरत पर निर्भर है, जो कि वास्तव में आत्म-प्रेम है|"
मुझे अभी भी याद है, जब हम अपने बेटे को जो कि अमेरिका जा रहा था टीका लगवाने के लिए सरकारी अस्पताल ले गए| वहां रिसेप्शन पर छोटे बच्चो के वजन तौलने वाला काउंटर था | वजन की मशीन के हुक में एक रोम्पर जैसी ड्रेस लटक रही थी| एक माँ अपने दो महीने के बच्चे का वजन लेने आई | उसका बच्चा बड़े आराम से अपनी माँ की गोद में सोया हुआ था| उसने उस बच्चे को तौलने वाले रोम्पेर बैग में डाला, तब तक बच्चे को कोई परेशानी नहीं हुयी, लेकिन जैसे ही उसकी माँ ने उसे हूक पर लटकाया, बच्चे ने अपनी जान बचाने के लिए अपने हाथ-पैर तेजी से मारे और चिल्ला कर रोने लगा
बच्चे ने ऐसा क्यों किया?
उसने असुरक्षित महसूस किया और अपनी काबलियत के अनुसार बचाव की कोशिश की
हम और तुम भी अपने जीवन को बचाने के लिए कुछ ऐसा ही करते है
क्या यह सच नहीं है?
याद रहें, "जीवन का हर एक्शन मनुष्य के जीने की आतंरिक और बेसिक ज़रुरत पर निर्भर है, जो कि वास्तव में आत्म-प्रेम है |"
हम अपने परिवार से प्रेम करते है, मित्रों से करते हैं, रिश्तेदारों से करते है और अपने पड़ोसियों से भी करते है | एक तरह से हम सभी अपने चाहने वालों के लिए अनमोल हैं |
परमेश्वर भी हमे अपने परिवार की तरह प्रेम करता है | हम परमेश्वर की निगाह में इतने अनमोल हैं कि उसने हमारे लिए अपना पुत्र दे दिया कि जो उस पर विश्वास करे वह अनंत जीवन पाए |
सन 2001 में मैंने अपने जीवन में इतना संघर्ष किया कि मुझे हर सड़क का अंत बंद लगा |  मैं तंजानिया में थी, मेरा बेटा मिशन स्कूल में पढ़ रहा था, मैं जिनसे मिलती थी वे यीशु को जानने वाले थे फिर भी किसी ने मुझे यीशु से नहीं मिलवाया| मेरे जीवन में उसकी सख्त ज़रुरत थी फिर भी वह मुझसे दूर रखा गया |
मुझे पूरा विश्वास है कि बहुत लोग अविश्वासियों के उद्धार के लिए प्रार्थना कर रहें होंगे
मुझे पूरा विश्वास है कि बहुत लोग भारतियों के उद्धार के लिए प्रार्थना कर रहें होंगे
मुझे इन सब बातों पर पूरा विश्वास है, लेकिन फिर भी मेरे पास एक भी व्यक्ति मसीह के प्रेम, चंगाई और उद्धार के सन्देश के साथ नहीं आया
उस दिन तक जब मैं पूरी तरह टूट गयी तब परमेश्वर ने मेरी एक मित्र को जो परमेश्वर में नहीं थी का प्रयोग किया, उसने मुझसे किसी ख़ास व्यक्ति के घर जाने को कहा और बोला उससे पूछो कि उसे कैसे छुटकारा मिला|
मैं एक बार फिर बोलूंगी, "जीवन का हर एक्शन मनुष्य के जीने की आतंरिक और बेसिक ज़रुरत पर निर्भर है, जो कि वास्तव में आत्म-प्रेम है|"
क्या तुम मुझसे पूछोगे कि मित्र के सुझाव का मुझ पर क्या प्रभाव पड़ा ?
मैं तुरंत समाधान के लिए भागी!
बोलो- आत्म प्रेम
बोलो- जीने की आतंरिक ज़रुरत
पढ़ें मत्ती 9:37-38
उसने अपने चेलों से कहा, "फसल तो बहुत खड़ी है, पर मजदूर थोड़े हैं, अतः खेत के मालिक से विनती करो कि वह अपने खेत में मजदूर भेजे |"
यीशु ने उपदेश सुनाया, चंगा किया और लोगों को उद्धार दिया
सोचो - मुझे कभी भी विश्वासियों के द्वारा सुसमाचार नाही मिला, लेकिन परमेश्वर ने एक अविश्वासी को मुझे मार्ग दिखाने के लिए प्रयोग में लिया
बोलो - परमेश्वर किसी को भी प्रयोग कर सकता है
बोलो - जीने की आतंरिक ज़रुरत
सोचो - तुम्हारा और मेरा परमेश्वर के राज्य में क्या रोल है
पढ़ें रोमियों 10:14-15
फिर वे उसे क्यों पुकारेंगे जिस पर उन्होंने विश्वास ही नहीं किया? और वे उस पर कैसे विश्वास करेंगे जिसके बारें में उन्होंने सुना ही नहीं? भला वे प्रचारक के बिना कैसे सुनेगे? और वे प्रचार कैसे करेंगे जब-तक वे भेजे नहीं जाएँ? ठीक जैसा कि लिखा है, "उनके पाँव कैसे सुहावने है जो भली बातों का सुसमाचार लाते है !
क्या तुम इंतज़ार कर रहें हो कि कोई तुम्हें भेजे?
तो मेरे पास तुम्हारे लिए एक अच्छी खबर है
पढ़े मत्ती 28:19-20
इसलिए जाओ और सब जातियों के लोगों को चेले बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो, और जो-जो आज्ञाएँ मैंने तुम्हें दी हैं उनका पालन करना सिखाओ| और देखो मैं युग के अंत तक सदैव तुम्हारे साथ हूं |
यीशु ने तुम्हे अनुमति दी है कि तुम जाओ और सुसमाचार सुनाओ | अगर तुम नहीं जाओगे, तो वह किसी और को भेज देगा | परमेश्वर लोगों में पक्षपात नहीं करता है | मैं तैयार हूं तो मुझे प्रयोग करेगा, तुम तैयार हो तो तुम्हे करेगा |
बोलो- अपने पडोसी को अपने समान प्रेम करो
बोलो- जीने की आतंरिक ज़रुरत
जिस रात्रि यीशु को सूली पर चढ़ाया गया, पतरस ने यीशु के विषय में तीन बार नाकारा | पतरस ने झूठ बोला क्योंकि वह भयभीत था, लेकिन बाद में उसको बहुत अफ़सोस हुआ और वह रोया | वही पतरस जब यीशु का पुनुरुत्थान हुआ तो वह पूरी तरह से बदल गया, क्योंकि तब वह यीशु का सत्य पूरी तरह से जान चुका था |
पढ़े युहन्ना 21:17
उसने उससे तीसरी बार कहा, "शमौन  युहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझसे प्रीति करता है?" पतरस उदास हुआ क्योंकि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा,, क्या तू मुझसे प्रीति करता है?" और उससे कहा, "हे प्रभु तू सब कुछ जानता है, तू यह भी जानता है कि मैं तुझसे प्रीति करता हूं|
यीशु ने उससे कहा, "तू मेरी भेड़ो को चरा"
आज हममे से प्रत्येक को यह प्रश्न करना चाहिए कि क्या मैं यीशु से प्यार करता हूं?
यीशु पतरस से पूछ सकता था, "क्या तुम विश्वास में दृढ हो, क्या कलीसिया में तुम सम्मानित स्थान पर नियुक्त हो, क्या तुमने दुष्ट आत्माएं भगाई है," लेकिन उसने तो साधारण तरीके से पूछा, शमौन, युहन्ना  के पुत्र, क्या तू मुझसे प्रीति करता है?
कुछ लोग अपना प्रेम अपने काम में, अपने परिवार में, सेवा के काम में लगा देतें हैं और यीशु को इंतज़ार करने देतें हैं
बोलो- यीशु से प्रीति करो
बोलो- जीने की आतंरिक ज़रुरत
यीशु से प्रीति करने से क्या मतलब है?
इसका मतलब है उसको जीवन में प्राथमिकता देना और उसके वचनों पर चलना
पढ़ें भजन संहिता 2:7-8
निश्चय ही मैं यहोवा के वचन का प्रचार करूंगा, उसने मुझसे कहा, "तू मेरा पुत्र है आज ही मैंने तुझे उत्पन्न किया है| मुझ से मांग तो निश्चय ही मैं जाति-जाति को तेरे उत्तराधिकार में और पृथ्वी के छोर तेरी निज भूमि होने के लिए दे दूंगा
यीशु से प्रीति करने का मतलब है उसके लोगों से प्यार करना
जो भी कुछ यीशु का है उसने उसे जो उस पर विश्वास करता है दे दिया .
उसने तुम्हें और मुझे पृथ्वी के छोर तक राज्य करने के लिए चुना है
हम उस छोटे बच्चे की तरह है जिसने अपने जीवन के बचाव के लिए हाथ-पैर इधर-उधर मारे
इस संसार में कोई भी नहीं है जो स्वर्ग से आया हो
इस संसार में कोई भी नहीं है जो तुम्हारे या मेरे लिए मरा हो
हाँ, यीशु ही एकलौता व्यक्ति है जो स्वर्ग से आया, जो मेरे और तुम्हारे लिए मरा और वह और केवल वह ही हमे जीवन दे सकता है, क्योंकि वह ही तीसरे दिन मृत्यु से जी उठा और मृत्यु पर विजयी हो गया
एक कदम उठाओ, जो लोग उसे नहीं जानते है उन्हें उसके बारे में बताओ
बोलो कि वह उनसे प्यार करता है
यीशु के उद्धार और चंगाई का सुसमाचार उन्हें बताओ
यदि कोई हमे नरक कि आग से बच सकता है तो वह सिर्फ यीशु ही है
बोलो- यीशु पूछ रहा है कि क्या तुम मुझसे प्यार करते हो
बोलो- यीशु आदेश देता है कि उद्धार का सुसमाचार बताओ
प्रार्थना -
पिता परमेश्वर यीशु के नाम पर -
लुका 10:2 के अनुसार हम प्रार्थना करते है कि हमे परमेश्वर के राज्य के विस्तार के लिए प्रयोग में लायें और हमे अपना आज्ञा कारी सेवक बनायें, यीशु के नाम पर 
अमीन

Monday, December 24, 2012

आत्मा का फल: मसीह चरित्र


परिचय : क्या तुमने "जल्दबाजी की बीमारी" के बारे में सुना है? अमेरिका में सब तरह की बीमारियाँ  है जो परंपरागत बीमारी नहीं समझी जाती  है.  जल्दबाजी की बीमारी ऐसे ही भ्रमित करने वाली  है, जो मुझे है. मै हमेशा इस जल्दी में रहता हूँ कि जो काम कर रहा हूँ उसे जल्द से जल्द ख़तम कर लूं. इसको ख़तम करूँ  और अगले  काम की तरफ बढूँ . जब मै गाड़ी चला रहा हूँ, मै जल्दी में हूँ.  जब हम हवाई अड्डे पर किसी को लेने जा रहें होते हैं, मेरी पत्नी मुझसे कहती है कि धीरे चलो नहीं तो बहुत जल्दी वहां पहुँच जायेंगे. मुझे पता है कि यह सत्य है लेकिन उसकी सलाह मानना मुश्किल लगता है.
यह आत्मा के फलों की श्रंखला का  अंतिम पाठ है. हमारा  इस हफ्ते का बाइबिल अध्यन, स्वर्ग में जल्दी पहुचने की अपेक्षाकृत  हमारे इस अध्यन की विशेषता का रास्ता सुझाता है, जोकि बहुत चिंता का विषय है.
चलो हमलोग बाइबिल अध्यन में लग जाये और आत्मिक जल्दबाजी की बीमारी का इलाज खोज़े!
I. पहली चीज़ पहले
 A. पढ़े मत्ती 6:31-33. क्या काफ़िर लोगों को भी जल्दबाजी की बीमारी है? (हाँ! वो इस दुनिया की चीजों के पीछे भागते है.)
1. मसीह लोगों को क्या करना है और क्या नहीं करना है  इसके बारे में बताता है? (अनिवार्यता की चिंता ना करो. निश्चय ही, उसके राज्य एवं धार्मिकता  को तलाशो")
a. क्या यह दोनों (उसका राज्य एवं धार्मिकता) आपस में सम्बंधित है?
(1) क्या मांगने का क्रम जरूरी है? यदि हाँ, इसका क्या मतलब है कि पहले परमेश्वर का राज्य मांगो,  परमेश्वर की धार्मिकता के विरोध में? (यह मोक्ष का सिद्धांत पहले विश्वास से दर्शाता है उसके बाद धार्मिक जीवन जीने का लक्ष्य निर्धारित करता है.)
b. इन पदों को ध्यान देकर सोचो. यहाँ किस बात का वादा किया गया है? (   यदि हम मोक्ष की प्राप्ति विश्वास से करते है,और धार्मिकता की खोज करते है, तो हमे किसी और वस्तु की खोज करने की जरूरत नहीं है.)                            
c. समय समय पर मै एक  अध्यात्म विद्या के मंत्री का लेख पढता जो कि विश्वसनी नहीं लगता है . एक दिन उसने लिखा कि वो अपना बाइबिल का कार्य रोक रहा है, कुछ आराम करेगा और उस दौरान पैसा कमाएगा जिससे उसके सेवानिवृति  के दिन ठीक से गुजर सकें. चूँकि मुझे उसकी अध्यात्म विद्या पसंद नहीं थी, मैंने सोचा कि यह बहुत अच्छा प्रस्ताव है! उसका यह विचार मत्ती 6 से कैसे मिलता है? (यह विपरीत है)
B. क्या तुमने कभी सोचा है कि यदि तुमने परमेश्वर के राज्य का विस्तार अपना मुख्य धेय्य बनाया है, तो यह केवल आत्मा के फल ही नहीं वरन वो सब भी देगा जो काफ़िर लोग पाने के लिए भाग रहें है?
II. महिमा के मार्ग पर
A. पढ़े 2 कुरंथियो  3:7-8 पत्थर पर खुदे वचन दस आज्ञाएँ है. क्या मूसा के चेहरे पर महिमा दिखाई पड़ी थी, यह दस आज्ञाओं  के साथ आई थी? (पढ़े निर्गमन 34:29-30. हमेशा परमेश्वर की संगति में  रहने के कारण मूसा का  मुख परमेश्वर की महिमा से चमक उठा )
B. पढ़े 2 कुरंथियो 3:13-18. क्या तुम्हरे पास इस बात की सम्भावना है कि तुम्हरा मुख भी परमेश्वर की महिमा से चमक उठे? (हाँ!)
1. मूसा को घूँघट की क्यों जरूरत थी जबकि तुम्हे नहीं है? (कानून लोगों को धार्मिकता के कारण मूसा के पास नहीं लाया. इसलिए, वो परमेश्वर की महिमा के आगे नहीं खड़े हो पाए. लेकिन, जब हम परमेश्वर की कृपा से बच जाते है तो घूँघट की जरूरत नहीं होती है- क्योंकि तुम्हारा  चेहरा भी परमेश्वर की महिमा से चमकता है.)
2. जब हम देखते है कि परमेश्वर की महिमा भी हमारे चेहरे पर चमक रही है, क्या हम अपने लक्ष्य तक पहुँच गए हैं? (किसी भी हालत में नहीं! हम " परमेश्वर के प्रतिरूप में हमेशा बढती हुई महिमा के कारण परिवर्तित हो गए हैं.")
3. दोस्तों, क्या तुम चाहते हो कि लोग तुम्हरे चेहरे पर परमेश्वर की महिमा देख कर आश्चर्यचकित हो जाएँ?

4. यह बदलाव किस प्रकार संभव है? (2 कुरंथियो 3:18 का अंतिम भाग दोबारा देखे: " जो परमेश्वर से आता है, वो आत्मा है." यह पवित्र आत्मा का हमारे जीवन में  कार्य है. कदाचित इस पाठ का शीर्षक : आत्मा का फल प्रफुल्लित चेहरा होना चाहिए था.)
C. हमारे जीवन की यात्रा में, हमे चीजों के पीछे भागने वाला नहीं, बल्कि आनंद फैलाने वाला  बनना है!
III. पथ निर्देशक

A. कुछ आधुनिक कारों में ऐसे उपकरण लगे रहते हैं कि जैसे ही वो अपनी लेन से बाहर निकली की अलार्म बोलने लगता है |                          पढ़े 2 कुरंथियो 13:5-6. क्या हमारे पास भी ऐसा उपकरण होना चाहिए जो हमारे रोजमर्रा के कार्यो का हिसाब रख सके? ( बाइबिल बताती है कि हमे अपनी भी समय समय पर जाँच करते रहना चाहिए कि हम विश्वास में हैं.)
1 . डिफाल्ट स्थिति क्या है? क्या हम विश्वास के साथ आरंभ करते है या विश्वास के बिना? (यह मसीहियों के बारे में है, बाइबल कहती है मसीह यीशु का तुम में होना डिफाल्ट की स्थिति है| "ज़ाहिर सी बात है जब तक तुम परीक्षा में असफल होते हो" |
2 . क्या होता है जब हम परीक्षा में असफल हो जाते हैं? ( इन पदों से पता चलता है कि हम विश्वास में नहीं हैं |
B.   पढ़ें 2 कुरंथियों 13:7-9. पौलुस अपने अनुभव के बारे में क्या कहता है? ( वह कहता है कि वह सत्य के विरोध में कुछ नहीं कर सकता है, लेकिन लोग यह सोच सकते है कि वह परीक्षा में असफल हो गया)
 1.   इसका मतलब यह है कि पौलुस क्या विश्वास में नहीं है? (पौलुस कुछ ऐसा कह रहा है कि कोई भी निष्कलंक नहीं है, लेकिन लक्ष्य निष्कलंक होना है)
 C.   पढ़ें 2 कुरंथियों 13:11. हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है? ("परिपूर्णता की ओर बढ़ना" | ऐसा जीवन जीना जो परमेश्वर की महीमा को जगमगाए)
 1.   शब्द "उद्देश्य" में क्या महत्वपूर्ण धारणाएं शामिल है? (लक्ष्य एक जानबूझ कर किया जाने वाला कार्य है | यह एक जाना-बूझा निर्णय है | लक्ष्य से यह भी निर्धारित होता है कि हम अभी तक मंजिल तक नहीं पहुंचे हैं)
  D.   पढ़ें युहन्ना 15:1-4. क्या हम मार्ग से अधिकतर भटक सकते है अगर हम निश्कलंकता के रास्ते पर ना हो? (अगर हम फलों से भरे नहीं हैं ( आत्मिक फल जिनके बारे में हम चर्चा कर रहें हैं), तब हम छटाई के लिए हैं)
 1.   फलदाई होने की कुंजी क्या है? ( यीशु में बने रहना| जिस तरह से यीशु कहता है बहुत आसान लगता है | कैसे एक पौधे का भाग फल धारण कर सकता जब तक कि वह मुख्य भाग से जुड़ा ना रहें?
  E.   पढ़ें  युहन्ना 15:9-10. यह किस तरह की परीक्षा है? हमारी गली की सतर्कता का अलार्म कब बंद होगा? कब जानेगे कि हमने जगमगाना बंद कर दिया है और जल्दबाजी शुरू कर दी है ? (जब हम परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना बंद कर  देतें हैं)
 1.   पहले हमने चर्चा की है (2 कुरंथियों 3:14) किस तरह दस आज्ञाओं ने लोगों के दिमागों को सुस्त कर दिया| क्या यीशु पौलुस की बात से सहमत है?
  F.   पढ़ें युहन्ना 15:12-17. क्या यीशु  आज्ञाएँ मानने का नया प्रस्ताव दे रहा है? (मैं नहीं जानता अगर यह कोई नयी बात है, लेकिन यह प्रस्ताव सीने पर्वत से  भिन्न है| अगर हम अपने चित्त की स्थिरता रखें और दस आज्ञाओं का पालन करें तो हमने सुस्त दिमाग के प्रस्ताव को अपनाया है| हम वास्तव में नहीं समझते कि क्या हो रहा है| दूसरी तरफ अगर हम यह विचार करें कि यीशु ने हमसे कितना प्रेम किया कि वह हमारे लिए इतनी पीड़ा जनक मृत्यु सह गया, और वह ऐसी मौत आज्ञाओं की आवशयकताओं को पूरा करने के कारण मरा, जबकि हम नहीं, तब यह हमारे दिलों में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने की इच्छा उमड़ पड़ती है )
 1.   क्या तुम दो दृष्टिकोणों के बीच का व्यवहारिक अंतर देख सकते हो?
 2.   यीशु की सेवक और मित्र के विषय की चर्चा क्या ज़ाहिर करती है? (सेवक एक छोटे बच्चे की तरह है बस उसे निर्देश देने की जरूरत है| स्पष्टीकरण देने की ज़रुरत नहीं है| तुम अपने मित्र और साथी को क्या करना है यह नहीं कह सकते हो| तुम्हें उन्हें समझाना पड़ेगा ताकि वे तुम्हारे उद्देश्य में हिस्सा बटा सके| हम दस आज्ञाओं को नियमों के उन गुच्छों की तरह नहीं ले सकते जो स्वर्ग में इनाम दिला सकते है | इन्हें हम एक अंदरूनी मार्ग दर्शक के तौर पर अपनायें जिससे परमेश्वर व लोगों के प्रति हमारा सम्बन्ध प्रेम दर्शा सके |
 G.   मित्र, हमारा मौजूदा सम्बन्ध परमेश्वर के साथ उसकी पवित्र आत्मा के जरिये है| आज से प्रार्थना करना शुरू कर दो की पवित्र आर्म पूरे समर्थ से तुम्हारे ऊपर आये और तुम्हें सही मनोभाव दे ताकि इस श्रंखला में जिन आत्मिक फलों के बारे में चर्चा की गई है वे तुम्हारे जीवन में दिखाई दें| क्या तुम प्रार्थना करोगे कि तुम्हारा जीवन निश्कलंकता के मार्ग पर चल पड़े ?

Sunday, December 16, 2012

परमेश्वर की महिमा हो उससे ही सब आशीषें हैं

परिचयआपका स्वास्थय कितना जरूरी हैक्या आप हर सुबह जब उठते हैं अपने आप को तरोताजा देखना चाहते हैं?  यदि पैसा कोई पैमाना हैमैंने पढ़ा है कि केवल अमेरिका में दो खरब डालर (खरबअरब नहीं)  से ज्यादा  हमारे स्वास्थय पर खर्च किया जाता  हैक्या परमेश्वर हमारे स्वास्थय का ध्यान रखता हैक्या धार्मिकता एवं स्वास्थय में कोई सम्बन्ध हैक्या हमारा परमेश्वर के साथ  कोई करार है  कि स्वास्थय रहने के लिए हम भरसक प्रयास करेंगेचलो हम बाइबिल अध्यन में लगजाते हैं और देखते हैं कि बाइबिल स्वास्थय के बारे में क्या बताती है
1. प्रशंसा  के कारण 
A. पढ़े भजन संहिता 103:1. "भीतर सेपरमेश्वर की प्रशंसा  करो इसका क्या मतलब होता है? ( यह दिखावटी प्रशंसा  नहीं है.  यह परमेश्वर की प्रशंसा  बिलकुल भीतरी भाग से हैबिलकुल गहराई से.)
B. पढ़े भजन संहिता 103:2. मैंने अक्सर लोगों को यह कहते सुना है कि हमे परमेश्वर की प्रशंसा करने चाहिए "क्योंकि वो कौन है." भजन लेखक परमेश्वर की प्रशंसा करने के लिए कौन से अतरिक्त  कारण देता है? (वो हमे लाभ पहुंचाता हैयह तो प्रशंसा करने  का बिलकुल स्वार्थी कारण लगता हैलेकिन यह स्वाभाविक है(और आसानउसकी प्रशंसा करना जो हमारी सहायता करता है.)  
C. पढ़े भजन संहिता 103:3-5. स्तुति लेखक यहाँ क्या वर्णन कर रहा है? (पहले से चर्चित फायदे जो परमेश्वर हमे देता है!)
1. चलो इन फायदों की लिस्ट बनाते हैं. (पाप से माफ़ीरोगों का उपचारहमे गड्ढे  से बाहर निकालनाप्रेम एवं अनुकम्पा देनाहमारी इच्छायों  की पूर्ति अच्छी चीज़ों सेहमे योवन देना.) 
a. जैसे तुम इस लिस्ट को देखते होक्या  इन फायदों में से किसी का भी स्वास्थय से कुछ लेना देना है? (हाँहमे जवानी की अनुभूति कराना एवं बिमारिओं से छुटकारा दिलाना है.) 
b. क्या तुम इस बात को कोई महत्त्व देते हो कि जब लेखक हमारे फायदों की लिस्ट बना रहा था उसने सबसे पहले पापों की माफ़ी रखी उसके बाद रोगों से मुक्ती? (अनंत जीवन इस धरती के जीवन से ज्यादा ठीक है.) 
(1) चलो इन दो फायदों को देखते हैं
हमारे पापों की माफ़ी तथा हमारे रोगों से छुटकाराविस्तारपूर्वक.
II. पापों से माफ़ी के लिए प्रशंसा करो.
A. पढ़े 2 तिमुथियस 1:9. परमेश्वर ने हमे हमारे पापों से छुटकारा दिलाने का प्लान कब बनाया था? ( समय शुरू होने से पहलेहमारे अस्तित्व में आने से पहले.)
1. परमेश्वर ने जब हमारी रचना करी यह उसके बारे में क्या संकेत देता है? (उसने हमारी रचना इस ज्ञान के साथ करी थी कि हो सकता है कि  हम उसको अस्वीकार कर देंगे.) 
a. कल्पना करो कि तुम माँ अथवा पिता हो और तुम्हरे बच्चे ने तुम्हे अस्वीकार कर दिया हैयदि तुम समय पीछे कर सकते थे और इस बच्चे को पैदा नहीं होने देतेक्या तुम ऐसा करते? (जो माता पिता यह कहते, "कि मै इस बच्चे कि अभिलाषा रखता हूँ"   असाधारण  प्रेम दिखाना हैहमारे परमेश्वर हमारे लिए वोही असाधारण प्रेम दिखाया है.) 
B. पढ़े इफिसियों 2:8-10.  क्या हम इस योग्य हैं कि हमारे पापों की माफ़ी हो तथा हमे  अनंत जीवन  मिले?  (नहींयह तो परमेश्वर की तरफ से उपहार हैना कि हमारे कार्यों का परिणामहालाँकिहमारी रचना अच्छे कार्य करने के लिए हुई है.)
C. अब हम समझ सकते हैं कि क्यों गीतकार भजन 103:3 में परमेश्वर की प्रशंसा हमारे पापों की माफ़ी के लिए करता है
III. परमेश्वर की प्रशंसा करे कि उसने हमे बिमारियों से छुटकारा दिलाया तथा किशोरावस्था दी 
पढ़े निर्गमन 15:26.  परमेश्वर की आज्ञा  मानना तथा बीमारी के बीच क्या सम्बन्ध है
1. क्या इसका मतलब यह हुआ क्योंकि हमने पाप किया है इसलिए बीमार हुए? (शायद)
2. याकूब की पुस्तक हमको इस विषय के बारे में क्या सिखाती है? (याकूब के "दोस्तउससे से कह रहें हैं कि तुम परमेश्वर की बात नहीं मानते हो इसलिए बीमार हो तथा पीड़ा में होलेकिनहमे याकूब की पुस्तक के पहले पाठ    से  पता है कि परमेश्वर ने शैतान से कहा था कि याकूब "दोषरहित एवं धार्मिकवो मनुष्य जो परमेश्वर का भय खाता है तथा बुराई से दूर रहता है." याकूब 1:8.)
a. याकूब एवं निर्गमन 15:26 से  बीमारी की जड़ के बारे में क्या निष्कर्ष निकाले?(कभी कभी हम बीमार हो जाते है कि हमने परमेश्वर का अनुकरण  नहीं किया और कभी हम बीमार हो जाते हैं कि हमने परमेश्वर का अनुकरण कियाइसके अलावाहमारा सामान्य ज्ञान हमे बताता है कि कभी  कभी  हम बीमार हो जाते है क्योंकि हम पापी दुनिया में रहते है.)
3. निर्गमन 15:26. के  कुछ  अंतिम शब्द देखे." मै तुम्हारा चंगा करने वाला परमेश्वर हूँ." क्या परमेश्वर का हमारे स्वास्थय में प्रतिकूल तथा अनुकूल कोई सम्बन्ध है? ( ऐसा जान पड़ता है कि परमेश्वर कह रहा है कि मै रोगों को ठीक करने वाला हूँयह परमेश्वर के सामान्य गुण हैस्वास्थय की तरफ एक सकारात्मक रुखहालाँकिपरमेश्वर अवज्ञाकारी के ऊपर बीमारी भी लाता हैपरमेश्वर हमारे स्वास्थय में स्वाकारात्मक  एवं नकारात्मक दोनों रूप में शामिल है.)    
B. पढ़े यिर्मयाहा 7:22-23. क्या परमेश्वर लोगों को उसकी आराधना करने की आज्ञा दे सकता था? (बिलकुलइसी तरह लोग मूर्ति देखा करते थे)        
1. परमेश्वर ने हमारे लिए और क्या किया? (परमेश्वर केवल हमारी प्राथर्ना  नहीं मांग रहा हैपरमेश्वर हमारे साथ सम्बन्ध बनाना देख रहा हैपरमेश्वर चाहता है कि हमारा जीवन सुख पूर्वक जाएऔर इसी कारण से उसने इतनी सारे आदेश दिए हैंयह आज्ञापालन का सकारात्मक पक्ष  है, "उपचारात्मकपक्ष.)
2. हम बाइबिल में इसके क्या उधारण देखते है? (यदि तुम लैव्यवस्था के पाठ 11-15 को  सरसरी नजर से देखे तो यह पायेगे कि परमेश्वर ने मूसा को बहुत सारे नियम दिए थे जिससे लोग स्वस्थ्य एवं रोग मुक्त रह सके.)
C. पढ़े नीति वचन 3:7-8. अहंकार से दूर रहोपरमेश्वर से डरोबुराई से कन्नी काटोक्या प्रतक्ष्य रूप से  इनका स्वाथ्य एवं मजबूत हड्डियों से कोई सम्बन्ध है?(यह आत्मिक एवं प्राकर्तिक स्वास्थय में सम्बन्ध दिखाता हैऐसा लगता है कि यह परमेश्वर का विचार है कि हमारे ऊपर निर्णय अथवा परख के कारण बीमारी आईऔर उपचार आशीष की तरह आयेधार्मिकता एवं स्वास्थय के बीच में कोई सहज सम्बन्ध हैआज्ञाकारिता का स्वाभाविक परिणाम मजबूत एवं स्वस्थ्य शरीर है.)    
  IV. त्याग की प्रशंसा करे 
A. पढ़े रोमिओ 12:1. मैंने सोचा यीशु परमेश्वर का मेमना था जो हमारे पापों को ले जाने की खातिर मराहम क्यों त्याग करते हैं
1. चलो हम इस समस्या का हल खोज़ेहमारे त्याग करने का क्या कारण है? ( "परमेश्वर के विचार से दया." यह उस दया की तरफ इशारा है जो यीशु ने हमको हमारे पापों के लिए मर कर दिखाईउसके अनुनयाई होने के कारण हमे वो ही त्याग वाली प्रवर्ती दिखानी होगी.)  
2. हमारा बलिदान यीशु के बलिदान से किस प्रकार भिन्न है? (हम लोग एक  "जीवितबलिदान हैमै इसको "मृत्युबलिदान के ऊपर चुनुगा!)
3. यह कैसे आराधना है? ( हमारी आराधना का एक हिस्सा उस परमेश्वर के लिए है जिसने अपना जीवन हमारे लिए बलिदान कियाउसके लिए हम कुछ बलिदान करते है.)
4. अब यहाँ एक गूढ़ प्रश्न आता हैहम किस प्रकार के बलिदान की बात कर रहें हैतुम्हे इससे क्या समझ में आता है कि तुम अपना "शरीरएक "जीवित बलिदानकी तरह भेंट कर दो?"
B. पढ़े रोमिओ 12:2. यह पूर्व प्रश्न का क्या संभावित जवाब देता है?(हमारा "बलिदानपरमेश्वर की वसीयत के अनुरूप है नाकि दुनिया की इच्छानुसार.)
1. रोमिओ 12:1. हमारे शरीर को उल्लिखित करता है और यह हमारे दिमाग को हवाला देता हैक्या यह दोनों जीवित बलिदान में शामिल है? (निसंदेह:, इसमें प्राकृतिक अंश हैस्वस्थ्य शरीर परमेश्वर के लिए "बलिदानका एक सकारात्मक रूप दिखाता हैहमारे कार्य करने के ढंग हमारे दिमाग की प्रवर्ती के अनुसार होते हैहमे दिमाग एवं शरीरका पूर्ण रूप से बलिदान देने की आवश्यकता है!) 
2. क्या स्वस्थ्य इसका एक भाग है? (इसका समानान्तर नया दिमाग तथा नया शरीर लगता हैयह हमारी परमेश्वर  की पूर्ण आराधना  को प्रदर्शित करती है.) 
3. सभी प्रकार के लोग अपने शरीर की पूजा करते हैंयह हमारे जीवन का एक उद्देश्य हैक्या हमने यहाँ पर इसकी  चर्चा करी है? (लेख हमे दुनिया के अनुरूप चलने के बारे में चेतावनी देता है.इसके स्थान परहमारी दिमाग एवं शरीर से की गयी आराधना हमारे परमेश्वर की महानता दिखाती है.) 
C. दोस्तोंअगर तुमने स्वास्थ्य एवं धार्मिकता के बीच के सम्बन्ध के बारे नहीं सोचा हैअगर तुमने अपने शरीर के बारे में अपनी परमेश्वर की आराधना का एक हिस्सा समझ कर नहीं सोचा हैक्या तुम आज इसबारे में गौर करोगेआज क्यों नहीं वचनबद्ध हो जाओ और परमेश्वर से कहो की वो तुम्हारीदिमाग ही नहींपरन्तुतुम्हरे शरीर  को भी एक "जीवित बलिदानबनाने में सहायता करे?